राजनाथ ने जर्मनी को रक्षा उत्पादन क्षेत्र में सहयोग के विस्तार के लिए आमंत्रित किया

Rajnath invites Germany to expand cooperation in defence production sector

राजनाथ ने जर्मनी को रक्षा उत्पादन क्षेत्र में सहयोग के विस्तार के लिए आमंत्रित किया

नई दिल्ली। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भारत और जर्मनी के बीच रक्षा प्रौद्योगिकी और साजो-सामान के संयुक्त विकास और निर्माण के महत्व पर बल दिया है।

जर्मनी की तीन दिन की यात्रा पर गये सिंह ने कहा कि उनकी सरकार का “आत्मनिर्भर भारत" अभियान सह-निर्माण, सह-विकास और सह-नवाचार का निमंत्रण है। म्यूनिख होकर बर्लिन पहुंचे रक्षा मंत्री ने मंगलवार को जर्मनी के सांसदों को संबोधित करते हुए दोनों देशों के रक्षा औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्रों के बीच सहयोग बढ़ाने की पुरजोर वकालत की। यात्रा के पहले दिन उन्होंने रक्षा एवं सुरक्षा संबंधी जर्मनी की संसद की स्थायी समिति को संबोधित करते हुए कहा कि आज दुनिया नए सुरक्षा खतरों का सामना कर रही है और तकनीकी परिवर्तन ने स्थिति को अत्यधिक जटिल बना दिया है। उन्होंने कहा कि बदलते परिवेश के अनुकूल ढलने की तत्परता के साथ एक नए दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

रक्षा मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में भारत रक्षा क्षेत्र में अभूतपूर्व परिवर्तन देख रहा है और जर्मन उद्योग के साथ साझेदारी बढ़ाने से दोनों देशों को महत्वपूर्ण लाभ मिल सकते हैं। सिंह ने कहा, “हम जर्मनी के अग्रणी औद्योगिक उद्यमों की स्थापित क्षमताओं को पहचानते हैं। साथ ही उन्नत और उभरती प्रौद्योगिकियों में प्रसिद्ध जर्मन मिटेलस्टैंड (लघु एवं मध्यम आकार की कंपनियों) के जोश और गतिशीलता की सराहना करते हैं। भारत में भी हमारे स्टार्टअप और उद्यमशील निजी कंपनियां तेजी से हमारे बड़े और स्थापित रक्षा उद्यमों की क्षमताओं को बढ़ा रही हैं और उनका पूरक बन रही हैं। यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां भारत और जर्मनी स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे के पूरक हैं और हमारी साझेदारी और भी गहरी हो सकती है।”

आधुनिक वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए सिंह ने समन्वित प्रतिक्रियाओं और भरोसेमंद रणनीतिक साझेदारियों की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि मोदी और जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ ने द्विपक्षीय रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने पर विशेष बल दिया है।

यूरोपीय संघ के स्तर पर भी विचारों में स्पष्ट एकरूपता दिखाई देती है और यह भारत के साथ उसके बढ़ते जुड़ाव में परिलक्षित होती है, जिसमें भारत-यूरोपीय संघ रक्षा और रणनीतिक साझेदारी भी शामिल है।

रक्षा मंत्री ने दोहराया कि भारत और जर्मनी न केवल रणनीतिक साझेदार हैं, बल्कि वर्तमान समय के वैश्विक विमर्श को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा, “हम स्थापित लोकतंत्र हैं जो साझा मूल्यों से बंधे हैं, और गतिशील अर्थव्यवस्थाएं हैं जो लचीलेपन, नवाचार और दृढ़ औद्योगिक भावना से संचालित हैं। सांसदों और समिति के सम्मानित सदस्यों के रूप में आपका मार्गदर्शन, राय और समर्थन हमारे रक्षा और रणनीतिक सहयोग के भविष्य को और मजबूत और समृद्ध बना सकता है।”

सिंह ने कहा कि मौजूदा भू-राजनीतिक अस्थिरता को अब क्षेत्रीय मामला नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि इसके परिणाम वैश्विक स्तर पर हैं। उन्होंने कहा कि यह स्थानीय अशांति नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए दूरगामी प्रभावों वाले गंभीर घटनाक्रम है। साथ ही इससे होने वाली मानवीय क्षति को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा, “भारत जैसे विकासशील देश के लिए, जो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के एक महत्वपूर्ण हिस्से के लिए पश्चिम एशियाई क्षेत्र पर निर्भर है, होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान कोई दूर की घटना नहीं है, बल्कि यह एक कड़वी सच्चाई है जिसका हमारी सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता पर सीधा प्रभाव पड़ता है।”

रक्षा मंत्री ने जर्मनी के सांसदों को बताया कि पश्चिम एशिया पर गठित मंत्रियों का समूह लगातार बदलती स्थिति का आकलन कर रहा है और इसके प्रभाव को कम करने के लिए समयोचित उपाय सुझा रहा है। उन्होंने कहा, “प्रमुख मंत्रालयों को एक साथ लाकर की गयी हमारी चर्चाओं का मुख्य उद्देश्य ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा, आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता बनाए रखना, मुद्रास्फीति के दबाव को नियंत्रित करना और नागरिकों के साथ-साथ उद्योगों को बाहरी व्यवधानों से बचाना है। यह वैश्विक संकटों का सामना शांति, दूरदर्शिता और प्रभावी संस्थागत समन्वय के साथ करने की भारत की क्षमता को दर्शाता है।”

जर्मनी के सांसद और सांसदीय समिति के अध्यक्ष थॉमस रोवेकैंप ने बैठक में सिंह का स्वागत किया। इससे पहले, रक्षा मंत्री ने बर्लिन पहुंचने पर हम्बोल्ट विश्वविद्यालय परिसर में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर को पुष्पांजलि अर्पित की।

रक्षा मंत्री के आगमन पर बर्लिन हवाई अड्डे पर उनका सैन्य सम्मान के साथ स्वागत किया गया। म्यूनिख से बर्लिन की उनकी यात्रा के दौरान लड़ाकू विमानों की सुरक्षा में उन्हें जर्मन वायु सेना के एक विशेष विमान में ले जाया गया।